Friday, 14 August 2015

मन को ये विश्वास बहुत है

तुम आओगे आस बहुत है

मन को ये विश्वास बहुत है


जीवन में संत्रास* बहुत है
फिर भी मन में प्यास बहुत है

देखा कब है यहां ख़ुदा को
पर उसका आभास बहुत है

मत मांगो तुम महल किसी से
कच्चा इक आवास बहुत है

आस्तीन का सांप रहा जो
वो ही उनका ख़ास बहुत है

जो सब कुछ दौलत को समझे
उसका होता ह्रास** बहुत है

कभी छोड़ कर तुम मत जाना
मुझको तुमसे ,आस बहुत है

यार मुहब्बत कहाँ मिलेगी
पाने की अरदास*** बहुत है

जब से ईमाँ बेचा मैंने
तब से दौलत पास बहुत है

लड़ने को आंधी से देखो
छोटी छोटी घास बहुत है

मौत एक दिन आनी 'सौरभ'
हाँ! इसका विश्वास बहुत है.

संत्रास*-- दुःख, तक़लीफ़
ह्रास**--- नुकसान, घाटा
अरदास*** --- इच्छा,  चाहत

~~~सौरभ शर्मा चिराग़~~~

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