Wednesday, 29 April 2015


एक दिन पूछा उन्होने मुझसे कि किसे चाहते हो ज्यादा,
खुदको या मुझको,
मैं क्या कहता क्या उत्तर देता,
कैसे बतलाता ये राज,
कि मैं तो मर चूका हूँ कबका,
बस उनके प्यार के लिए जीता हूँ,
अब की मैं खो चूका हूँ खुदको,
सारे चिन्ह और खूबियां मेरी कब और कहाँ खो गयी,
नहीं जानता मैं, अब मैं हूँ क्योंकि तुम हो,
जो सीखा अब तक भूल गया हूँ,
जानते है सब मुझको की जानता हूँ मैं तुमको,
तुम्हारे होने से मैं हूँ,
लोग लेते है नाम मेरा क्योंकि जानता हूँ मैं,
अपनी सारी ताकत गवां चुका हूँ मैं,
पर मज़बूत हूँ तुम्हारे बल से मैं,
अब मैं स्वयम् को चाहता हूँ बहुत ज्यादा तुमसे भी ज्यादा,
क्योंकि मैं, मैं नहीं तुम हो, अब मैं प्यार करता हूँ मैं से,
क्योंकि मैं बन चुका हूँ तुम, बस तुम, सिर्फ तुम....!!!

‪#‎सौरभशर्माचिराग‬

Wednesday, 22 April 2015

                        ***दिल का कोना***

समय कुछ भी कहानी कहे,अनकही कहे, अनजानी कहे,
जिंदगी सुनाये कुछ भी फैसला, मेरे हक़ में या मेरे खिलाफ,
तुम प्यार करो या दो जितना दर्द, पास आओ या दूर हो कितने भी ऐ हमदर्द,
भली-भाँति एक बात जानता हूँ मैं, की मेरे दिल के एक कोने में तुम रहोगे सदा,
हमेशा-हमेशा सदा सर्वदा।।

एकदिन उन्होंने हँसकर पूछा की बाकी में कौन रहता है,

बाकी हिस्सों में, क्या समझाऊँ उनको, कैसे बतलाऊं उन्हें,
कि मेरा दिल बहुत बड़ा है, पर इसमें ना कोई जगह खाली है,
एक हिस्से में रहते है वो, और बाकी में कहीं उनकी यादें, कहीं उनका ख्याल,कहीं दर्द, कहीं उनकी जगाई प्यास, तो कहीं महकती साँस, तो कहीं तड़प, कसम और प्यार ने डाला डेरा है,
दिल का कोई भी कोना ना मेरा है, उनकी आरज़ू, तमन्ना, चाहत ने ऐसी जगह बनाई है,
लगता है मुझको की मेरी रूह भी अब इस दिल के लिए पराई है,
कहने को तो दिल बहुत बड़ा था मेरा, पर ठूंस ठूंस के भरी है ये सब, और कई तो अभी भी प्रतीक्षित है,
उनकी जुदाई, बेरुखी, अलगाव को तो कहीं भी जगह ना मिल पाई है, उनकी बहुत सी चीजें अभी भी कतार में हैं, और वो पूछते है मुझसे, कि बाकी कौन कौन से हिस्से दूसरों के प्यार में हैं, प्यार में हैं।।।

Thursday, 2 April 2015

मैं तुझे चूमना चाहता हूँ

***मैं तुझे चूमना चाहता हूँ***

मैं नही जानता की किस अधिकार से...,
लेकिन चाहता हूँ की बस एक बार प्यार से...,
मैं तुझे चूमना चाहता हूँ ।।
हाँ बस तुझे चूमना चाहता हूँ ।।

नही जानता की क्या अधिकार है तुझपे मेरा।।
नही चलता है खुद पर भी अब जोर नही मेरा।।
सब कुछ भुलाकर अब यही दोहराना चाहता हूँ।।
मैं तुझे चूमना चाहता हूँ।।

जानता हूँ की ये सब तेरे लिए आसान नही है।।
तू खुद अब इस बात से अनजान नही है।।
मगर इस सब से दूर मैं तुझको ले जाना चाहता हूँ।।
मैं तुझे चूमना चाहता हूँ।।

जाने अनजाने किया मैंने खुदसे एक वादा है।।
मैं तो बस धूल हूँ , और तू कोई "माथा" है।।
हाँ इस धूल को तेरे माथे सजाना चाहता हूँ।।
मैं तुझे चूमना चाहता हूँ।।
हाँ बस तुझे चूमना चाहता हूँ।।

*****सौरभ शर्मा*****