Wednesday, 22 April 2015

                        ***दिल का कोना***

समय कुछ भी कहानी कहे,अनकही कहे, अनजानी कहे,
जिंदगी सुनाये कुछ भी फैसला, मेरे हक़ में या मेरे खिलाफ,
तुम प्यार करो या दो जितना दर्द, पास आओ या दूर हो कितने भी ऐ हमदर्द,
भली-भाँति एक बात जानता हूँ मैं, की मेरे दिल के एक कोने में तुम रहोगे सदा,
हमेशा-हमेशा सदा सर्वदा।।

एकदिन उन्होंने हँसकर पूछा की बाकी में कौन रहता है,

बाकी हिस्सों में, क्या समझाऊँ उनको, कैसे बतलाऊं उन्हें,
कि मेरा दिल बहुत बड़ा है, पर इसमें ना कोई जगह खाली है,
एक हिस्से में रहते है वो, और बाकी में कहीं उनकी यादें, कहीं उनका ख्याल,कहीं दर्द, कहीं उनकी जगाई प्यास, तो कहीं महकती साँस, तो कहीं तड़प, कसम और प्यार ने डाला डेरा है,
दिल का कोई भी कोना ना मेरा है, उनकी आरज़ू, तमन्ना, चाहत ने ऐसी जगह बनाई है,
लगता है मुझको की मेरी रूह भी अब इस दिल के लिए पराई है,
कहने को तो दिल बहुत बड़ा था मेरा, पर ठूंस ठूंस के भरी है ये सब, और कई तो अभी भी प्रतीक्षित है,
उनकी जुदाई, बेरुखी, अलगाव को तो कहीं भी जगह ना मिल पाई है, उनकी बहुत सी चीजें अभी भी कतार में हैं, और वो पूछते है मुझसे, कि बाकी कौन कौन से हिस्से दूसरों के प्यार में हैं, प्यार में हैं।।।

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