Thursday, 11 June 2015

परिस्तिथियों का खेल


परिस्तिथियों के बशीभूत होकर,
मेरा सबकुछ चाहते हुए भी,
कुछ ना कर पाना,
बड़ा मजबूर कर देता है,
मानने को, कि कोई और भी है,
जिसकी इच्छा के बिना,
कोई कुछ नही कर सकता,
समर्थ होते हुए भी, जो असमर्थता रहती है,
बड़ी पीड़ादायक होती है,
उसका एहसास भी मुझको समझा जाता है,
कि सबकुछ मेरे हाथ में नही है,
परिस्थितियों की गहराई समझने पर,
मुझे ये समझ आता है,
कि,
अगर परिस्थितियां मेरे हाथ में होती,
कितना अच्छा होता,
हँसना और रोना,
पाना और खोना,
सब पर मेरा अधिकार रहता,
जब भी दर्द और पीड़ा से घिरता,
बदल देता उन परिस्थितियों को...........
.
................... कभी आने ना देता,
अपने और अपनों के ज़ीवन में परेशानी,
और कोई मजबूरी, जिससे वो और मैं,
हो जाते दूर, और ना देता कोई मौका,
उस परिस्थिति के पैदा होने का,
जो आज देती है मुझे दर्द,
अपनों से बिछड़ जाने का,
अगर परिस्थितियों को बदलने की,
शक्ति मेरे हाथ में होती,
नही होता वह सब जो हो चुका है....!!
~~~सौरभ शर्मा चिराग~~~

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