इक नई रचना मित्रों आपके समक्ष प्रस्तुत है।।
*
क्या हुआ जो हम छप न पाएं, पुस्तक या अखबारों में,
ये क्या कम है, जो अपनी गिनती है खुद्दारों में,
*
फितरत से अंजान हूँ लेकिन, फिर भी इतना जानता हूँ,
कुछ दुश्मन निकलेंगे मेरे, छुपे हुए इन यारों में,
*
मौके पे जो जान लुटा दें, कैसे भी हालातों में,
अपनी भी यारी रहती है, कुछ ऐसे दिलदारों में,
*
वो तो कोई और ही होंगे, जिनका चलता उसपर जोर,
हम तो कही नहीं आते है, हाँ उनके हकदारों में,
*
गुरूर हुश्न पर अपने हो तो, ये उसको समझा देना,
उससे अच्छा हुश्न है मिलता, आजकल बाज़ारों में,
*
उसने कितना दर्द दिया है, क्या बतलाऊँ मैं तुमको,
बस उसको लिखता रहता हूँ, मैं अपने अशआरों में,
*
अंधेरों में रहकर के, एक यही एहसास हुआ है,
एक "चिराग" ही बेहतर है, इन सारे अंधियारों में..!!!
*
~~~*सौरभ शर्मा "चिराग"*~~~
*
क्या हुआ जो हम छप न पाएं, पुस्तक या अखबारों में,
ये क्या कम है, जो अपनी गिनती है खुद्दारों में,
*
फितरत से अंजान हूँ लेकिन, फिर भी इतना जानता हूँ,
कुछ दुश्मन निकलेंगे मेरे, छुपे हुए इन यारों में,
*
मौके पे जो जान लुटा दें, कैसे भी हालातों में,
अपनी भी यारी रहती है, कुछ ऐसे दिलदारों में,
*
वो तो कोई और ही होंगे, जिनका चलता उसपर जोर,
हम तो कही नहीं आते है, हाँ उनके हकदारों में,
*
गुरूर हुश्न पर अपने हो तो, ये उसको समझा देना,
उससे अच्छा हुश्न है मिलता, आजकल बाज़ारों में,
*
उसने कितना दर्द दिया है, क्या बतलाऊँ मैं तुमको,
बस उसको लिखता रहता हूँ, मैं अपने अशआरों में,
*
अंधेरों में रहकर के, एक यही एहसास हुआ है,
एक "चिराग" ही बेहतर है, इन सारे अंधियारों में..!!!
*
~~~*सौरभ शर्मा "चिराग"*~~~
No comments:
Post a Comment