Friday, 14 August 2015

मन को ये विश्वास बहुत है

तुम आओगे आस बहुत है

मन को ये विश्वास बहुत है


जीवन में संत्रास* बहुत है
फिर भी मन में प्यास बहुत है

देखा कब है यहां ख़ुदा को
पर उसका आभास बहुत है

मत मांगो तुम महल किसी से
कच्चा इक आवास बहुत है

आस्तीन का सांप रहा जो
वो ही उनका ख़ास बहुत है

जो सब कुछ दौलत को समझे
उसका होता ह्रास** बहुत है

कभी छोड़ कर तुम मत जाना
मुझको तुमसे ,आस बहुत है

यार मुहब्बत कहाँ मिलेगी
पाने की अरदास*** बहुत है

जब से ईमाँ बेचा मैंने
तब से दौलत पास बहुत है

लड़ने को आंधी से देखो
छोटी छोटी घास बहुत है

मौत एक दिन आनी 'सौरभ'
हाँ! इसका विश्वास बहुत है.

संत्रास*-- दुःख, तक़लीफ़
ह्रास**--- नुकसान, घाटा
अरदास*** --- इच्छा,  चाहत

~~~सौरभ शर्मा चिराग़~~~

Sunday, 21 June 2015

~~*इधर प्यार के गीत गाना मना है*~~

यहाँ दिल से दिल का लगाना मना है
अगर लग भी जाए तो बताना मना है,
.
इधर जालिमों की बस्ती है प्यारे
इधर प्यार के गीत गाना मना है,
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करो भूल लाखों मगर ये समझ लो
यहां भूल को भूल जाना मना है,
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नजर को झुकाकर उन्हें देख भी लो
नजर से नजर को मिलाना मना है,
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न हँसो तोड़कर यहाँ दिल किसी का
यहाँ टूटे दिलों पर मुस्कुराना मना है,
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समझ लो चिराग यही है हकीकत
यहां किसीके लिए खुदको जलाना मना है...!!
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~~सौरभ शर्मा चिराग~~
~~09760569910~~

Thursday, 11 June 2015

परिस्तिथियों का खेल


परिस्तिथियों के बशीभूत होकर,
मेरा सबकुछ चाहते हुए भी,
कुछ ना कर पाना,
बड़ा मजबूर कर देता है,
मानने को, कि कोई और भी है,
जिसकी इच्छा के बिना,
कोई कुछ नही कर सकता,
समर्थ होते हुए भी, जो असमर्थता रहती है,
बड़ी पीड़ादायक होती है,
उसका एहसास भी मुझको समझा जाता है,
कि सबकुछ मेरे हाथ में नही है,
परिस्थितियों की गहराई समझने पर,
मुझे ये समझ आता है,
कि,
अगर परिस्थितियां मेरे हाथ में होती,
कितना अच्छा होता,
हँसना और रोना,
पाना और खोना,
सब पर मेरा अधिकार रहता,
जब भी दर्द और पीड़ा से घिरता,
बदल देता उन परिस्थितियों को...........
.
................... कभी आने ना देता,
अपने और अपनों के ज़ीवन में परेशानी,
और कोई मजबूरी, जिससे वो और मैं,
हो जाते दूर, और ना देता कोई मौका,
उस परिस्थिति के पैदा होने का,
जो आज देती है मुझे दर्द,
अपनों से बिछड़ जाने का,
अगर परिस्थितियों को बदलने की,
शक्ति मेरे हाथ में होती,
नही होता वह सब जो हो चुका है....!!
~~~सौरभ शर्मा चिराग~~~

Friday, 5 June 2015

~~क्या हुआ जो हम छप न पाये पुस्तक या अखबारों ~~

इक नई रचना मित्रों आपके समक्ष प्रस्तुत है।।
*
क्या हुआ जो हम छप न पाएं, पुस्तक या अखबारों में,
ये क्या कम है, जो अपनी गिनती है खुद्दारों में,
*
फितरत से अंजान हूँ लेकिन, फिर भी इतना जानता हूँ,
कुछ दुश्मन निकलेंगे मेरे, छुपे हुए इन यारों में,
*
मौके पे जो जान लुटा दें, कैसे भी हालातों में,
अपनी भी यारी रहती है, कुछ ऐसे दिलदारों में,
*
वो तो कोई और ही होंगे, जिनका चलता उसपर जोर,
हम तो कही नहीं आते है, हाँ उनके हकदारों में,
*
गुरूर हुश्न पर अपने हो तो, ये उसको समझा देना,
उससे अच्छा हुश्न है मिलता, आजकल बाज़ारों में,
*
उसने कितना दर्द दिया है, क्या बतलाऊँ मैं तुमको,
बस उसको लिखता रहता हूँ, मैं अपने अशआरों में,
*
अंधेरों में रहकर के, एक यही एहसास हुआ है,
एक "चिराग" ही बेहतर है, इन सारे अंधियारों में..!!!
*
~~~*सौरभ शर्मा "चिराग"*~~~

Tuesday, 26 May 2015

~~यार तुम भी कमाल करते हो~~

बेवफाओं का ख्याल करते हो
यार तुम भी कमाल करते हो,

तेरा "सानी" नहीं जमाने में
हर सितम बेमिसाल करते हो,

वो अदा तेरी कातिलाना है
जिस अदा से निहाल करते हो,

जो भी होना था हो गया अब तो
क्यों भला तुम मलाल करते हो,

आपका क्या अजब तरीका है
दिल चुराकर हलाल करते हो,

आकर इस कद्र मेरी यादों में
क्यों मेरा जीना मुहाल करते हो,

जानकर सबकुछ मेरे बारे में
क्यों मुझसे सवाल करते हो,

भूल जाओ "चिराग" वो बातें
बेवजह क्यों बवाल करते हो...!!!

~~~पंडित सौरभ शर्मा चिराग~~~
# 9760569910

Saturday, 23 May 2015

*****बारिश मेरी आँखों से अब रूकती नहीं है*****


मेरे जज़्वातों को ये दुनियाँ समझती नहीं है,
बारिश मेरी आँखों से अब रूकती नहीं है।।

कितना भी छुपा लो ये ज़ाहिर हो ही जाती है,
मौहब्बत वो शै है जो किसी से छिपती नहीं है।।

कभी रोता नहीं हूँ तुझे मैं याद कर करके,
क्योंकि रोने से कभी यादें मिटती नहीं है।।

बेईमानी और भ्रष्टाचार है फैला हर जगह अब,
ईमानदारी किसी के पास अब टिकती नहीं है।।

चाहता हूँ हमेशा तेरे साये में रहना क्योंकि,
तेरे बिना "चिराग" की अपनी कोई हस्ती नहीं है।।

यहाँ सब लोग "सौरभ" केवल मौका परस्त है,
पहले सी इंसानियत अब किसी में दिखती नहीं है।।

~~*सौरभ शर्मा चिराग*~~

Wednesday, 6 May 2015

****बरबादों को ढूंढ रहा हूँ****

आबादों को ढूंढ रहा हूँ,
बर्बादों को ढूंढ रहा हूँ,

मुझसे झूठे किये जो तुमने,
उन वादों को ढूंढ रहा हूँ,

जिनमे तुम्ही छुपे रहते हो,
उन यादों को ढूंढ रहा हूँ,

जिनसे जीती बाज़ी हारा,
उन प्यादों को ढूंढ रहा हूँ,

आँखों से सावन बहता है,
पर भादों को ढूंढ रहा हूँ,

रिश्ते की थी जो नीव हमारे,
उन बुनियादों को ढूंढ रहा हूँ।।।

#सौरभशर्माचिराग